तेलुगु कथा साहित्य – (कहानी के विशेष संदर्भ में)

भारत की भूमि सदियों से विश्व के आकर्षण का केन्द्र रही है । यह आकर्षण मात्र भौतिक धन-दौलत के कारण ही नहीं है परन्तु उसके व्यूहात्मक स्थान, भौगोलिक समृद्धि, सुनियोजित सदियों पुरानी संस्कृति, विद्वानों और उनकी प्रतिभा से जन्मे जीवन रहस्य, औषधियों की जानकारी, व्यापार-वाणिज्य, धर्म की निजी समझ, निजी जीवन शैली से जन्मी समृद्ध परंपराएँ, अनेकता के बीच रही अनोखी एकता, विविधता से भरे धरती-रूप – समुद्र, नदियाँ, मैदान, रण से लेकर बर्फ से ढँके हुए पर्वत – यह सबकुछ एक ही स्थान पर हो ऐसा देश शायद ही इस धरती पर था और होगा । इसलिए सदियों से हमारा व्यवहार विश्व के अनेक देशों के साथ रहा है । देश-विदेश से हमारे यहाँ यात्री, विद्यार्थी, यौद्धा, विद्वान, भक्त, भगवान, आक्रमणकारी, राजा और प्रजा के समूह निरंतर आते ही रहे हैं । इन सबकी अपनी समझ थी, इन सबकी अपनी जरूरत थी । सभी कुछ न कुछ पाते रहे हैं इस भारत की भूमि से ।

इसीलिए एक भाषा से दूसरी भाषा के साथ का संक्रमण हमारे यहाँ नया नहीं है । एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति का संक्रमण भी हमारे यहाँ नया नहीं है । भिन्न भिन्न मत-मतान्तरों से हमें कभी हैरानी नहीं हुई है । हमारी इस विरासत ने एक निजी उदारता का गुण विकसित किया है । कभी खुलकर तो कभी सिमटकर, कभी दुबककर तो कभी नक्षत्रों को नापने की उँचाई तक हम सहज भाव से ही पहुँच सके हैं । तो फिर कभी उसके अभिमान या उसके कोपीराईट के संकुचित घेरे में भी बन्द नहीं रहे । इसलिए अनुवाद की कला हमारे संस्कारों में बहुत सहज भाव से देखने मिलती है । बारहवीं –तेरहवीं सदी से गुजराती, भारतीय श्रीलंका से लेकर आफ्रिका मिडल इस्ट के देश हो या जावा-सुमात्रा या मोरेशियस हो- हमारे पूर्वजों को व्यापार करने में कभी भाषा बाधा नहीं बनी है ।

रामायण, महाभारत या बाद के संस्कृत के अनेक महाकाव्य, नाटक, खंडकाव्य आदि हमें संस्कृत भाषा में मिलते हैं । साथ ही समूचे भारत की अनेक भाषाओं में अलग-अलग समय में हुए उनके अनुवाद भी प्राप्त होते हैं । उदाहरण के रूप में देखें तो वल्लभ विद्यापीठ यहाँ गुजरात में ही थी । उसके बारे में हमारे पास अधिक अधिकृत प्रमाण कम हैं परन्तु दूसरी तरफ  ह्यु-एन-सांग नामक चीनी यात्री ने उसकी विस्तार से चर्चा की थी – वह आज बिलकुल अधिकृत जानकारी के साथ चीनी भाषा में उपलब्ध है । यह संभव हुआ उसके यात्रा-ग्रंथ के अनुवाद से । ऐसा तो बहुत कुछ उदाहरण के तौर पर बताया जा सकता है । शक और क्षत्रपों का शासन ई. पूर्वे डेढ़ सौ साल पहले से गुजरात में था और उनकी मुद्राओं पर लिखे गए ग्रीक भाषा के शब्द हमें अपने इतिहास की जानकारी देने में सहायक सिद्ध हुए हैं । यह अनुवाद का महत्व है ।

उत्तर भारतीय प्रदेशों के भाषा-कुल एक होने से समझने-बोलने और अनुवाद करने में आसानी रहती है । परन्तु दक्षिण भारतीय प्रदेशों में बोली जाने वाली द्रविड़ कुल की भाषाओं को सीखना, समझना और उनका अनुवाद करना उत्तर भारत के लोगों के लिए स्वाभाविक रूप से ही मुश्किल रहा है । बावजूद इसके केन्द्रीय साहित्य अकादमी, कुछ प्रकाशन संस्थानों और गुजरात में कुछ गिने चुने अनुवादकों द्वारा यह कार्य होता रहा है – परिणाम स्वरूप गुजरात के पाठकों के लिए दक्षिण के प्रदेशों का साहित्य सहज उपलब्ध भी रहा है और आस्वाद्य भी रहा है ।

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आरंभ में गुजराती और तेलुगु साहित्य के बीच अनायास देखने मिलती कुछसाम्यता की बात करना चाहता हूँ । गुजरात में जब दलपतराम मध्यकालीन शैली छोड़कर अंग्रेजी जैसा लिखने का आरंभ करते हैं और दूसरी तरफ नर्मदाशंकर लालशंकर दवे (1833-1886) आधुनिक ढंग से ही लिखना शुरू करते हैं- वह था 1840 से 1880 के आसपास का समय खंड । नर्मद का मुख्य लक्ष्य सुधार है । पहला उपन्यास- करणघेलो- प्रकट हुआ (1866) ।

तेलुगु साहित्य में उसी कालखंड में गद्यब्रह्म और गद्यतिक्क नाम से अत्यंत प्रसिद्ध हुए वीरेशलिंगम पंतुलु (1848 से 1919) साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय होते हैं । वे 1878 में राजशेखर चरित्रम (इन्दुलेखा) नामक उपन्यास लेकर उपस्थित होते हैं । उन्होने स्वीकार किया है कि अंग्रेज विद्वान गोल्ड स्मिथ की रचना – विकर ओफ ध वेकफिल्ड- को ध्यान में रखकर इस उपन्यास की रचना की है । इस दृष्टि से गुजराती साहित्य और तेलुगु साहित्य का आधुनिक काल एक साथ और समान ढंग से शुरु हुआ है । इस समय में गुजराती साहित्य में जो  समस्याएँ केन्द्र में थी वे- बाल विवाह, विधवा-विवाह, सतीप्रथा, अंधश्रद्धा, अस्पृश्यता, निरक्षरता, भूत-प्रेत, छल-कपट, अज्ञानता और षडयंत्र- तेलुगु साहित्य के प्रथम उपन्यास इन्दुलेखा में भी शायद अधिक गहराई से निरूपित होकर उजागर हुई हैं ।

राजशेखर चरित्रम् में अत्यंत धनवान और उदारमना राजशेखर और उसका परिवार चित्रित हुआ है । अति धनवान होने के कारण उसके आसपास कैसे कैसे धूर्त मित्रों की टोली जमा होती है, सगे-सम्बन्धी किस प्रकार उसका शोषण करते हैं इसका बड़ा ही सूक्ष्मनिरुपण कथा के प्रवाह को तो गतिशील रखता ही है साथ ही साथ उस समय के आन्ध्रप्रदेश के ब्राह्मणों की संकुचित मनोवृत्ति, आपसी सम्बन्धों की जटिलता, उनके लोभ-लालच, अहंकार और कुरिवाजों को लेखक बराबर खोलता जाता है । ज्योतिषियों की मायाजाल, पांडित्य का खोखलापन, स्त्रियों की अवदशा, उनकी अज्ञानता और खास करके उस समय के शिवमार्गियों- पुष्ठिमार्गियों के बीच का संघर्ष, उनके षडयंत्रों को लेखक निर्दय होकर उजागर करता जाता है । यह लेखक डांडियो के रचनाकार नर्मद जैसी ही वीर भाषा प्रयुक्त करता है । ऐयाशी करते पंडित, पित्तल से सोना बनाने की लालच में फँसते तथाकथित बौद्धिक, रीत-रिवाज के पीछे अंधी दौड़ लगाते मूर्ख, धन का व्यय करके बिल्कुल रोड पर आ जाने के बाद भी सतत अहंकारग्रस्त रहने वाले ब्राह्मणों की स्थिति इस कथा में बखूबी निरूपित हुई है । यदि पढ़े-लिखे ब्राह्मणों की यह स्थिति हो तो अन्य वर्ग के लोगों के लिए को यह दशा उनसे भी अधिक खराब होने के संकेत इस कथा के प्रत्येक पृष्ठ पर मिलते हैं ।

इन सबके के आलेखन के लिए वे बोध वचन सीधे नहीं कहते । उनका लहजा उपहासपूर्ण जरूर है, लगातार हँसी के फव्वारे उड़ते हैं । पात्रों की मूढ़ता के लिए हास्य पैदा होने के साथ मन में पीड़ा भी महसूस होती रहती है कि कैसी अज्ञानता में हमारे पूर्वज जीते थे । सामने दिखने वाले सत्य को अनदेखा करके काल्पनिक भय, काल्पनिक सत्य की आराधना करने के लिए कैसे कैसे छल का आश्रय लेकर दूसरों को और अंतत:  अपने आपको छलते रहते थे।

गुजराती उपन्यास का आरंभ ऐतिहासिक कथानक से हुआ । परन्तु बाद में प्रकट होने वाली कथा- सरस्वतीचंद्र- में तत्कालीन समाज निरूपित हुआ है । परन्तु यह बात यहाँ प्रासंगिक नहीं है इसलिए छोड़ता हूँ । अब बात करूँगा कहानी के संदर्भ में…… ।

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संख्या में कम परन्तु तेलुगु कहानियाँ गुजराती साहित्य में अनूदित हुई है । कहानी का स्वरूप अधिक चुस्त है । सैलाब की तरह बहते कथावेग और प्रभावशाली चित्तक्षोभ पैदा करने वाला यह साहित्य स्वरूप बड़े से बड़े लेखक की सर्ग शक्ति की कसौटी करने वाला स्वरूप है । मलयानिल ने गोवालणी कहानी से गुजराती कहानी का आरंभ किया उसी तरह तेलुगु कहानी के प्रथम रचनाकार हैं – गुरजाड अप्पाराव । आरंभ से ही उसमें सामाजिक प्रतिबद्धता देखने मिलती है । आंध्रप्रदेश और खास करके दक्षिण भारत की कलासंस्कृति की अपनी महक इन कहानियों में शामिल होती रही है । आरंभिक दौर में स्वाभाविक रूप से ही सीधी-सरल कथन प्रयुक्ति में समरेख दिशा में आगे बढ़ने वाली कहानियाँ मिलती है और बाद में उसमें क्रमश: विकास दिखाई देता है । विषयों का व्याप बढ़ता है । सामाजिक, पौराणिक, ऐतिहासिक कथानकों से विषय चुनाव के अलावा आलेखन में वर्णन, संवाद, रेखाचित्र, स्पष्ट रूप से आदि-मध्य और धारदार अंत वाली कहानियाँ लिखी जाने लगी । विशेष रूप से श्री चिंता दीक्षितुलु और वेलूरि शिवराम शास्त्री ने तेलुगु कहानियों को निश्चत आयाम देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।

गुजराती कहानियों की तर्ज पर देखें तो गांधीजी का प्रभाव आंध्रप्रदेश में भी देखा जा सकता है । हाशिये का मनुष्य कहानियों में निरूपित हुआ है । श्री कोडवटिगरि कुटुंबराव और श्री गोपिचंद और जमीनी यथार्थ का आलेखन करने वाले श्री कविकोंडर वेंकटरामन का योगदान उल्लेखनीय रहा है ।

गुजराती कहानियों में जब आधुनिक दौर आता है तब संरचना पर ध्यान केन्द्रित होता है । कहानी में घटना का ह्रास करने का अभिगम, भाषा का सर्जनात्मक विनियोग, स्थानीय पहचान भूलाकर वैश्वक संवेदना को घ्रहण करने की दिशा खुलती है । श्री गुडिपाटि वेंकटचलम इस तरह तेलुगु कहानियों में नये प्रस्थान का आरंभ करते हैं । उनकी कहानियों में आधुनिक संवेदना, स्व की खोज, वर्तमान समय के कटु यथार्थ को निरूपित करने के सशक्त प्रयास तेलुगु कहानी को नया मोड़ देते हैं । तो श्री धनिकांड हनुमंतराव और भरद्वाजजी की कहानियों में नारी संवेदना का आलेखन ध्यान आकर्षित करने वाला सिद्ध हुआ है । श्री अडिवि बापिराजु, श्री सुरवरम प्रताप रेड्डी, श्री जमदग्नि जैसे कहानीकारों की कहानियों में स्त्री-पुरूष के जातीय सम्बन्घों के अपूर्व चित्रों का आलेखन देखने मिलता है । जातीय समस्याओं को केन्द्र में रखकर लिखी गई ये कहानियाँतेलुगु कहानियों में अलग पहचान खड़ी करने योग्य बन गई हैं । कथन कला और रचना रीति के प्रयोग करने में आगे रहे हैं श्री मुनि माणिक्यम । इसके अलावा मनोविश्लेषण पर आधारित कहानियों के लेखन में श्री बुच्चि बाबु, श्री पालगुम्मि पद्मराजु, श्री भास्करबट्ल कृष्णराव, श्री मधुरान्तकम राजाराम, बोम्मिरेकीपल्लि सूर्याराव जैसे लेखकों ने प्रयोगशीलता और कवचित प्रयोगखोरी की सीमा तक विस्तार किया है । गुजराती कहानी के आधुनिक दौर को कुछ आलोचक कहानी का दम घूटने वाला दौर या पाठक को दूर करने वाला दौर कहते हैं ऐसा ऊपर बताये गए कहानीकारों के संदर्भ में तेलुगु कहानियों में भी देखने मिलता है ।

यह मोटी विकासरेखा है । इनमें कई नाम, कई विशेषताएँ तेलुगु साहित्य के विद्वान जोड़ सकते हैं परन्तु इस स्वरूप में भी देख सकते हैं कि आधुनिक भारतीय साहित्य में विविधता होने के अलावा आंतरिक प्रवाहों की समानता भी इतनी ही व्यापक रूप से देखी जा सकती है ।

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मेरे व्याख्यान के अंतिम दौर में दो कहानियों के बारे में थोड़ी बात करना चाहता हूँ । पतिव्रत की हत्या (गुडिपाटि वेंकटचलम) और दूसरी कहानी है प्राणदाता (मधुरान्तकम राजाराम)

पतिव्रत की हत्या- का समय लगभग बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक के बाद काहै । भारत के शहर अब तक हावी नहीं हुए थे वह समय । गाँव और शहरों के बीच अंतर था । बैलगाडियों का जमाना था । बसें नयी नयी और कहीं कहीं ही शुरू हुई थी । कई ऐसे लोग थे जिन्होंने कभी शहर और शहर की रंगीनियां, नाटक-सिनेमा आदि नहीं देखे थे । कल्पना भी नहीं की थी । ऐसी ही एक नारी रंगम्मा जो वीरा रेड्डी की पत्नी है । वह बहुत आग्रह के बाद नेल्लूर के मेले में जाने के लिए तैयार होती है । कहानी में बस का सफर, उस समय पहली बार परपुरूष के साथ सीट में बैठना पड़ा वहाँ से शुरू करके नेल्लूर पहुँचती है वहाँ तक की यात्रा हास्य उत्पन्न करने वाली है । परन्तु शहर देखने के बाद उसकी चेतना में उठने वाले विचारों को लेखक ने बखूबी प्रस्तुत किया है – यहाँ का प्रत्येक जन, प्रत्येक दुकानदार, पुलिस, फकीर, गाडीवान सभी बड़े हैं । लोग कैसी अंग्रेजी, तेलुगु और हिन्दी बोलते हैं….सभी मनुष्य प्रसन्न दिखते हैं । नेल्लूर का सामान्य मनुष्य भी उसके पति से बड़ा है । यह अपने पति को ही केन्द्र में रखकर अब तक जीने वाली रंगम्मा में आया हुआ परिवर्तन है । वह देखती है कि गाँव के लोग पति का सन्मान करते हैं, नौकर-चाकर भी उसके पति के सामने थर थर काँपते हैं । परन्तु उसका वही पति यहाँ लोगों के बीच, सडक पर या मोटर में कितना असहाय बन गया है ….शुरू में तो उसे यह स्थिति अपमानजन्य लगती है परन्तु साथ ही साथ उसके मन में पति गिरता, निर्माल्य होता भी लगता है । यह पतन कृष्णलीला नाटक देखने जाने के बाद जो मोड आता है वहाँ कहानी का क्लायमेक्स है । नाटक का कृष्ण बनने वाला नट इस मुग्ध रंगम्मा का चरित्र हनन करने में बिलकुल हिचकिचाता नहीं है । ऐसा कहानी का अर्थ कई अर्थच्छायाओं को जन्म देने वाला बन पड़ा है ।

दूसरी कहानी प्राणदाता की नायिका नीरजा के व्यापक जीवन को निरूपित करती होने के बावजूद कहानी के लिए आवश्यक तीक्ष्ण गति से ओतप्रोत है । दादा पंतुलु की सेवा सुशृषा किस प्रकार नीरजा के जीवन की दिशा बदल देने वाली सिद्ध होती है इसका इस कहानी में प्रभावशाली ढंग से निरूपण हुआ है । इसमें लेखक ने दादा का जो वर्णन किया है वह मुझे तेलुगु के गद्यब्रह्मा के रूप में पहचाने जाने वाले श्री पंतुलु के व्यक्तित्व की याद दिलाने वाला लगता है । यह कहानी चेतना पर अमिट छाप छोड़ने वाली प्रतीत हुई है । नीरजा को मरीज के रूप में मिली हुआ पार्थसारथी अब पति के रूप में मिलता है । ऐसा क्यों हुआ उसका बहुआयामी आलेखन इस कहानी को अलग ताजगी देने वाला सिद्ध हुआ है ।

इनके अलावा भी हत्या (नवीन) कहानी में हुआ मानसशास्त्रीय निरूपण, इंटरव्यू(चलसाति प्रसादराव) कहानी में सिफारिश की बोलबाला तो डोक्टरों के खोखलेपन का निरूपण करने वाली कहानी सो. य. शास्त्री से प्राप्त हुई है । श्रीपति की कुरसी नामक कहानी भी यादगार बन पड़ी है ।

समय के अभाव में अपनी बात समेटकर कहूँगा कि तेलुगु कथा साहित्य और गुजराती कथा साहित्य का आदान-प्रदान जितना अधिक होगा, अनुवाद अधिक होंगे उतनी नयी क्षितिजें खुलती जाएगी और दोनों प्रदेशों, देश के विविध प्रदेशों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक विविधता और विशेषताएँ प्रकट होती जाएगी ।

डॉ. नरेश शुक्ल, डिपार्टमेन्ट ओफ गुजराती, वीर नर्मद दक्षिण गुजरात युनिवर्सिटी, सुरत-7